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कल्याण सिंह की वापसी से भाजपा का होगा फायदा या पार्टी में बढ़ेगी गुटबाजी?

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राजस्थान के पूर्व राज्यपाल और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके कल्याण सिंह एक बार फिर भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने रविवार को प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इस दौरान उनके बेटे एवं एटा से सांसद राजवीर सिंह और प्रदेश के वित्त राज्यमंत्री एवं पौत्र संदीप सिंह भी मौजूद रहे। कल्याण सिंह ने 2014 में राजस्थान का राज्यपाल बनने के बाद भाजपा से त्यागपत्र दे दिया था। इस मौके पर 87 वर्षीय कल्याण सिंह ने कहा कि इतनी उम्र गुजर जाने के बावजूद न तो वह थके हैं और न ही उनका मन छोटा है। उनके शब्दों में, “मेरा तन टायर नहीं है, मन रिटायर नहीं है।” कल्याण सिंह ने अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे पर भी खुल कर बात की। उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण करोड़ों लोगों की आस्था का प्रश्न है। जितनी पार्टियां हैं, वे जनता के सामने अपना मत स्पष्ट करें कि वे राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में हैं या फिर उसके विरोध में। सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी तारीफ की और कहा कि वह अच्छा काम कर रहे हैं। 

हालांकि कल्याण सिंह के सक्रिय राजनीति में लौटते ही उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में बतौर आरोपी अदालत में पेश करने के लिए सीबीआई ने अर्जी दाखिल कर दी है। इसका मतलब साफ है कि आने वाले दिनों में उन्हें कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ सकते हैं। हालांकि उनकी सक्रिय राजनीति में वापसी प्रदेश भाजपा खासकर योगी आदित्यनाथ की सरकार के लिए भी एक चुनौती बन सकती है। दरअसल, कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। पहले जब वह सक्रिय राजनीति में थे तब उनकी पार्टी नेताओं के साथ प्रतिद्वंदिता जगजाहिर थी। उत्तर प्रदेश भाजपा कई गुटों में बंटी हुई थी। राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र जैसे पुराने और दिग्गज नेता अब राज्य की राजनीति से बाहर हो गए हैं। ऐसे में देखा जाए तो कल्याण सिंह की वापसी राज्य की नए पीढ़ी के नेताओं के लिए एक तरफ प्रेरणादायी होगी तो दूसरी तरफ सत्ता संभाल रहे लोगों के लिए मुश्किलें भी खड़ी कर सकती है।    
कल्याण सिंह की वरिष्ठता को देखें तो उनकी बातों और सुझावों को पार्टी और योगी सरकार के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल हो सकता है। इतना ही नहीं, खुद योगी आदित्यनाथ को कल्याण सिंह के साथ सामंजस्य बैठा कर चलने में दिक्कतें आ सकती हैं। अगर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में योगी की टक्कर का कोई नेता राज्य की राजनीति में नहीं है। कुछ नेता योगी के बराबरी के तो थे पर सत्ता की बागडोर हाथ में आने के बाद इनसे काफी पीछे छूट गए। जैसे की केसव मौर्य, दिनेश शर्मा आदि। अब कल्याण सिंह की वापसी से उनकी राज्य सरकार के फैसलों में दखलअंदाजी बढ़ सकती है। हो सकता है आने वाले दिनों में पार्टी के नेता, सांसद और विधायक कल्याण सिंह के यहां राजदरबारी करते दिखें जो योगी और उनके साथ वाले बड़े नेताओं के लिए मुश्किलें पैदा करेगा। इसके अलावा यह पार्टी में गुटबाजी को भी बढ़ावा देगा। ये बात सभी को पता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह से साथ कल्याण सिंह के संबंध अच्छे हैं।
क्या भाजपा का कर पाएंगे कल्याण
सवाल उठता है कि जिस पार्टी में 75 वर्ष की आयु के बाद नेताओं को अपनी राजनीति सक्रियता त्यागनी होती है उस पार्टी में 87 वर्षीय कल्याण सिंह की वापसी क्यों हो रही है? उत्तर प्रदेश में भाजपा को शून्य से शिखर पर पहुंचाने वाले कल्याण सिंह को पार्टी राज्य में एक बार फिर पिछड़ों का चेहरा बनाने के मूड में दिख रही है। कल्याण सिंह के भारी भरकम व्यक्तित्व का पार्टी फिलहाल उपचुनावों में फायदा उठाने की फिराक में है। इसके अलावा कल्याण सिंह को ब्रांड हिंदुत्व के तौर पर भी पार्टी राज्य में स्थापित कर सकती है क्योंकि सत्ता की बागडोर संभालने के बाद योगी थोड़े संयमित हो गए हैं। उनके बयान से भी यही लगता है कि वह राम मंदिर को लेकर एक बार फिर मुखर होंगे। पार्टी को यह भी पता है कि यूपी में कल्याण सिंह की आज भी राजनीतिक पकड़ अच्छी है। यही देखने को भी मिला जब वह अमौसी एयरपोर्ट से भाजपा मुख्यालय तक का सफर तय कर रहे थे तो रास्ते में जयश्रीराम के नारे की गूंज थी। अब तो यही देखना होगा कि कल्याण सिंह पार्टी

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